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The generation born between 1960 and 1980 – We too had a time

हमारा भी एक ज़माना था – 1960 से 1980 की पीढ़ी

1960 से 1980 में जन्मी पीढ़ी – हमारा भी एक ज़माना था

यह वही पीढ़ी है जिसने 45 वर्ष पार करते हुए 65–70 की ओर कदम बढ़ाए हैं। जिसने जीवन के सबसे बड़े बदलाव देखे और उन्हें अपनाया।

बदलते ज़माने की गवाह पीढ़ी

1, 2, 5, 10, 20, 25, 50 पैसे से लेकर डिजिटल भुगतान तक का सफर तय करने वाली पीढ़ी। स्याही–कलम से शुरू होकर आज स्मार्टफोन और लैपटॉप चलाने में माहिर।

जिसके बचपन में साइकिल भी शान हुआ करती थी, वही आज कार चलाती है। संघर्षों में पली यह पीढ़ी संस्कारों से मजबूत बनी।

टेप रिकॉर्डर और ट्रांजिस्टर कभी बड़े सपने थे। गली में खेलना, कैरी तोड़ना, दोस्तों के घर बेझिझक जाना – यही असली बचपन था।

दोस्त के घर खाना खाना आम बात थी। शिक्षक से डर भी था और सम्मान भी। आज भी गुरु दिख जाएँ तो सिर झुक जाता है।

न मोबाइल था, न सोशल मीडिया – सिर्फ मिलने की उत्सुकता होती थी।

VCR पर फिल्में देखना, गली क्रिकेट खेलना, किताबों पर कवर चढ़ाना – यही हमारी खुशियाँ थीं।

ट्यूशन शर्म की बात मानी जाती थी। पास-फेल ही सब कुछ था। प्रतिशत का कोई दबाव नहीं था।

हमने कभी "I Love You" नहीं कहा, लेकिन रिश्तों में सच्चा प्यार भरा होता था।

हमने नोटबंदी देखी, कोरोना देखा, लॉकडाउन झेला और वैक्सीन का दौर भी। इतने बदलाव शायद ही किसी और पीढ़ी ने देखे हों।

गुज़रे दिन लौटकर नहीं आते, लेकिन उनकी यादें जीवन भर साथ रहती हैं।

हम अच्छे हों या बुरे — लेकिन हमारा भी एक ज़माना था!

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