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पंचामृत: सनातन संस्कृति का दिव्य अमृत

पंचामृत: सनातन संस्कृति का दिव्य अमृत

पंचामृत: सनातन संस्कृति का दिव्य अमृत

सनातन संस्कृति में पंचामृत को अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है। ये ना केवल मंदिरों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है, बल्कि शिवलिंग के अभिषेक में भी इसका उपयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पंचामृत इतना महत्वपूर्ण क्यों है? और इसे अमृत की संज्ञा क्यों दी गई है?

देखिए, 'पंच' का अर्थ होता है पाँच और 'अमृत' का मतलब होता है अमरत्व देने वाला दिव्य रस। यानि पाँच ऐसे पदार्थों का संयोग जो अमृत के समान गुणकारी हो, वही पंचामृत है।

आयुर्वेद में पंचामृत की निर्माण विधि:
"गव्यमाध्यमं दधिक्षीरं माक्षिकं शर्करान्वितम्।
एकत्र मिलितं गीयं दिव्यं पंचामृतं परम्।"

इसका मतलब है गाय का घी, दूध, दही, शहद और शर्करा इन पाँच द्रव्यों को सम मात्रा में मिलाने से पंचामृत बनता है। इसे दिव्य कहा गया है क्योंकि यह शरीर, मन और आत्मा तीनों के लिए लाभकारी होता है।

पंचामृत के पाँच द्रव्य और उनके गुण

अब इन पाँचों द्रव्यों के गुणों को समझते हैं, जिससे स्पष्ट होगा कि पंचामृत को क्यों अमृत की संज्ञा दी गई है:

  • 1. गाय का घी

    आयुर्वेद के अनुसार घी अत्यंत बलवर्धक होता है। ये वात और पित्त दोष को शांत करता है, नेत्रों के लिए हितकर होता है और पाचक अग्नि को प्रज्वलित करता है। इसके नियमित सेवन से शरीर में ऊर्जा और मानसिक स्थिरता बनी रहती है।

  • 2. गाय का दूध

    ये ओज और तेज का स्त्रोत है। गाय का दूध शरीर की सप्त धातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र) को पोषण देता है। ये बुद्धि वर्धक है, इसलिए इसे 'जीवनीय' कहा गया है, जिसका अर्थ होता है जीवन को पोषित करने वाला।

  • 3. दही

    ये शुभता और ऊर्जा का प्रतीक है। दही को 'मांगल्य्य' कहा गया है, यानि शुभ फलदाई। आयुर्वेद में कहा गया है: "रोचनम् दीपनं वृश्यम् स्नेहनं बलवर्धनम्"। इसका मतलब है कि दही पाचन शक्ति को बढ़ाता है, शरीर को ऊर्जा देता है, प्रजनन क्षमता सुधारता है और बलदायक होता है।

  • 4. मिश्री (शर्करा)

    मिश्री एकमात्र ऐसी मिठास है जिसे आयुर्वेद ने सर्वथा हितकारी बताया है। ये प्राकृतिक शीतलता प्रदान करती है और शरीर में आवश्यक ऊर्जा को संतुलित भी करती है।

  • 5. शहद (माक्षिक)

    आयुर्वेद में शहद को विशेष स्थान मिला हुआ है। इसके लिए कहा गया है: "चक्षुश्यम दीपनं स्वर्यं सौकौमार्यकरं सूक्ष्मं परमस्रोतो विशोधनम्"। इसका मतलब है कि शहद नेत्रों के लिए लाभकारी होता है, पाचक अग्नि को बढ़ाता है, स्वर को मधुर बनाता है और सूक्ष्म नाड़ियों की शुद्धि करता है। ये शरीर की अंदरूनी सफाई करके इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है।

स्वास्थ्य के लिए पंचामृत का महत्व

पंचामृत सिर्फ खाने की चीज नहीं है, ये सेहत का खजाना है। आयुर्वेद में इसे 'अजीर्णभूत वातघ्न' कहा गया है, जिसका मतलब होता है कि ये हमारे पाचन को सुधारता है, हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करता है और वात दोष को संतुलित करता है।

सेवन का सही तरीका

अति सर्वत्र वर्जयेत। किसी भी चीज की अति हानिकारक होती है। पंचामृत का नियमित सेवन करें लेकिन अल्प मात्रा में। मंदिरों में प्रसाद रूप में जितनी मात्रा मिलती है, उतनी मात्रा सर्वोत्तम मानी जाती है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य:
आयुर्वेद में कहा गया है कि घी और शहद समान मात्रा में मिलाने पर विष के समान हो जाते हैं, लेकिन जब इन्हें अन्य द्रव्यों (दूध, दही, शर्करा) के साथ मिश्रित किया जाता है, जैसे पंचामृत में, तो ये नियम लागू नहीं होता। इसलिए पंचामृत सुरक्षित रहता है।

निष्कर्ष

पंचामृत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि ये शरीर, मन और आत्मा के लिए एक संपूर्ण पोषण है। ये शारीरिक रूप से बलवर्धक और रोगनाशक है, मानसिक रूप से चिंता को दूर करता है और आध्यात्मिक रूप से चेतना को ऊर्जावान बनाता है।

तो आईए इस दिव्य अमृत को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं, स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और सात्विक जीवन की ओर कदम बढ़ाएं।

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