हनुमान की भक्ति : विवेकपूर्ण समर्पण, न कि अंधभक्ति
VIGYAN
हनुमान की भक्ति : विवेकपूर्ण समर्पण, न कि अंधभक्ति
हनुमान की भक्ति : विवेकपूर्ण समर्पण, न कि अंधभक्ति ॐ हनुमान की भक्ति : विवेकपूर्ण समर्पण, न कि अंधभक्ति श्रीराम के प्रथम दर्शन में छुपा गहरा संदेश हनुमान जी को हम भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त के रूप में जानते हैं। उनकी भक्ति अतुलनीय और उदाहरणीय है, लेकिन क्या यह अंधभक्ति थी? क्या वे बिना सोचे-समझे राम के चरणों में गिर पड़े थे? बिल्कुल नहीं। हनुमान जी सच्चे भक्त थे, लेकिन अंधभक्त नहीं। वे सुग्रीव के मंत्री थे और अपने राजा के प्रति कर्तव्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को अलग रखकर विवेक के साथ कार्य किया। पहली मुलाकात: परीक्षा और विवेक का क्षण जब श्रीराम और लक्ष्मण सुग्रीव की खोज में आए, तब हनुमान जी ने साधारण ब्राह्मण का रूप धारण कर लिया। उन्होंने अपनी पहचान छिपाई और श्रीराम से प्रश्न पूछे। चरणों में गिरने की बजाय उन्होंने उनके आचरण, वेशभूषा, शस्त्रों और तेज को अपनी बुद्धि की कसौटी पर परखा। दोनों राजसी दिखते थे, लेकिन तपस्वियों जैसी वेशभूषा थी — यह विरोधाभास उन्हें खटका। इसलिए उन्होंने सत्य की जाँच की।
“समर्पण तभी सार्थक है जब वह विवेकपूर्ण हो और धर्म…