खतरनाक सत्य
कल्पना कीजिए आप रास्ते पर चल रहे हैं और आपको दो मूर्तियाँ मिलती हैं – एक भगवान राम की और दूसरी रावण की।
आपसे कहा जाए कि इनमें से कोई एक मूर्ति अपने घर ले जाइए। तो शायद आप बिना सोचे-समझे राम की मूर्ति उठाएँगे – क्योंकि वह सत्य, निष्ठा और सकारात्मकता के प्रतीक हैं।
अब सोचिए वही परिस्थिति दोबारा हो लेकिन इस बार राम की मूर्ति पत्थर की है और रावण की मूर्ति सोने की।
अब आप क्या करेंगे? बहुत संभव है कि इस बार आप रावण की सोने की मूर्ति उठाएँगे, और राम की पत्थर वाली मूर्ति वहीं छोड़ देंगे।
इसका मतलब यह हुआ कि हम अक्सर सत्य और असत्य, सकारात्मक और नकारात्मक को अपनी सुविधा और लाभ के अनुसार तय करते हैं।
हमारी सोच का एक और पहलू:
- 25 साल की उम्र तक हमें परवाह नहीं होती कि लोग क्या कहेंगे।
- 50 साल तक हम इसी डर में जीते हैं – लोग क्या सोचेंगे?
- 50 के बाद समझ आता है – लोग तो कभी सोच ही नहीं रहे थे!
“सबसे बड़ा रोग – क्या कहेंगे लोग।”
जब तक हम इस डर से नहीं निकलेंगे, हम अपने जीवन के असली फैसले नहीं ले पाएंगे।

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