शिवोहम – एक भिखारी की प्रेरणादायक यात्रा
रेल यात्रा में भीख मांगते समय एक भिखारी ने एक अमीर दिखने वाले सेठ को देखा। उसे उम्मीद थी कि यह आदमी जरूर कुछ अच्छा देगा। लेकिन हुआ कुछ और…
सेठ ने भिखारी से कहा –
“तुम हमेशा मांगते हो, लेकिन कभी कुछ देते भी हो?”
भिखारी ने जवाब दिया – “मैं तो भिखारी हूँ साहब, मेरे पास देने के लिए कुछ है ही नहीं।”
सेठ मुस्कराया और बोला –
“तो तुम्हें मांगने का भी अधिकार नहीं है। मैं लेन-देन में विश्वास करता हूँ – कुछ दोगे, तभी कुछ मिलेगा।”
इतना कहकर सेठ स्टेशन पर उतर गया। लेकिन उसकी बात भिखारी के दिल में उतर गई। उसने सोच लिया कि अब वह भी कुछ न कुछ बदले में देगा।
फूलों का उपहार
अगले दिन स्टेशन के पास उसे खिले हुए फूल नजर आए। उसने सोचा – “क्यों न मैं भीख देने वाले को फूल दे दिया करूँ?”
अब वह रोज कुछ फूल तोड़ता, और भीख देने वालों को बदले में फूल देता। लोगों को यह भाव बहुत पसंद आया। धीरे-धीरे उसे और अधिक लोग भीख देने लगे।
फिर से मुलाकात
एक दिन वह भिखारी ट्रेन में भीख मांगते समय उसी सेठ से दोबारा मिला। उसने कहा –
“आज मेरे पास देने को फूल हैं, आप मुझे कुछ दीजिए।”
सेठ ने मुस्कराते हुए पैसे दिए और बदले में फूल लिए।
सेठ बोला – “वाह! आज तुम भी व्यापारी बन गए हो।”
भिखारी के भीतर कुछ जागा। उसने ट्रेन से उतरते ही आकाश की ओर देखा और गर्व से चिल्लाया –
“मैं भिखारी नहीं, व्यापारी हूँ… मैं भी अमीर बन सकता हूँ!”
एक वर्ष बाद…
एक साल बाद वही स्टेशन… दो सज्जन यात्रा कर रहे थे। उनमें से एक ने दूसरे को प्रणाम किया और बोला –
“सेठ जी, आपने मुझे पहचाना? मैं वही भिखारी हूँ…”
“आपकी बातों ने मेरी जिंदगी बदल दी। अब मैं फूलों का बहुत बड़ा व्यापारी हूँ।”
जो केवल मांगते हैं, उन्हें शायद बहुत कम मिलता है। लेकिन जो बदले में कुछ देते हैं—even if it’s just a flower—उन्हें दुनिया लौटाकर बहुत कुछ देती है। देने की भावना ही असली समृद्धि है।

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