डेढ़ टिकट
महानगर के एक अंतिम बस स्टॉप पर बस रुकी। दरवाज़ा खुलते ही एक वृद्ध ग्रामीण, एक हाथ में बाल गणेश की सुंदर मूर्ति और दूसरे से सहारा लेते हुए बस में चढ़े।
भीड़ में जैसे-तैसे जगह पाकर जब उन्हें संतुलन बनाने में परेशानी हुई, तो कंडक्टर ने अपनी सीट खाली कर दी। मूर्ति को पेट से लगाकर वे बैठ गए। मूर्ति इतनी सुंदर और जीवंत थी कि जल्द ही सबकी नजरें उस पर टिक गईं। कुछ हाथ जुड़ गए, कुछ आंखें श्रद्धा से भर आईं।
जब कंडक्टर ने उनसे पूछा, "कहां जाओगे दद्दा?" तो दद्दा ने पैसे निकालने की कोशिश की, लेकिन मूर्ति संभालने के कारण असफल रहे।
"अभी रहने दीजिए, उतरते वक्त दे दीजिएगा।" – कंडक्टर बोला, और दद्दा फिर निश्चिंत हो बैठ गए।
थोड़ी देर बाद कंडक्टर ने सहजता से पूछा, "गांव में भी तो मिलती होंगी ऐसी मूर्तियां, फिर इतनी दूर शहर से क्यों ला रहे हैं?"
दद्दा की कहानी
दद्दा मुस्कराए और बोले, "मिलती तो हैं, पर ऐसी नहीं। यह मूर्ति मेरे और मेरी पत्नी के जीवन की सबसे बड़ी उम्मीद और भावनात्मक धरोहर है।"
उन्होंने बताया कि कैसे वे दोनों संतान सुख से वंचित थे। वर्षों पहले पत्नी की नजर इसी मूर्ति पर पड़ी और जैसे मातृत्व फूट पड़ा।
"‘मेरा बच्चा’ कहते हुए उस मूर्ति को उसने सीने से लगा लिया। तब से हर साल हम यहीं से यही मूर्ति लेते हैं। अब वह चल नहीं सकती, पर मैं हर साल उसे यह सुख देने आता हूं।"
मूर्ति विसर्जन के प्रश्न पर दद्दा ने बताया – पूजा विधि से होती है, विसर्जन भी होता है, लेकिन इन दस दिनों में घर में एक बच्चे की तरह बाल गणेश का स्वागत होता है – रंगोली, तोरण, छोटे बर्तन, कपड़े – सब कुछ!
आखिरी मोड़ पर
बस अब उनके गांव पहुंचने वाला था। मूर्ति संभालते हुए वे उठे। एक युवक ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया। मूर्ति धीरे से उसके हाथों में थमा कर, कंडक्टर को पैसे देते हुए बोले –
"लो बेटा, डेढ़ टिकट काटना।"
कंडक्टर चौंका, "आप तो अकेले आए हैं न?"
दद्दा की मुस्कान दिल छू गई:
"दोनों नहीं आए क्या? एक मैं और एक यह हमारा बाल गणेश।"

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