ईश्वर या धन? आप क्या चाहते हैं?

ईश्वर या धन? आप क्या चाहते हैं?

ईश्वर या धन? आप क्या चाहते हैं?

एक बार एक नगर के राजा के यहाँ पुत्र का जन्म हुआ। खुशी में राजा ने ऐलान किया कि अगली सुबह राजदरबार आम जनता के लिए खोला जाएगा।

“जो व्यक्ति सुबह सबसे पहले जिस वस्तु को छुएगा, वह वस्तु उसकी हो जाएगी।”

नगर में उत्साह की लहर दौड़ गई। लोग रातभर सोचते रहे — कोई बोले "मैं सोने के बर्तन लूंगा", कोई बोले "मुझे घोड़े चाहिए", तो कोई कहे "मैं हीरे जवारात छूऊँगा"।

राजदरबार में अफरा-तफरी

सुबह दरबार खुलते ही लोग दौड़ पड़े। हर कोई जल्दी से जल्दी अपनी मनपसंद वस्तु को छूना चाहता था।

इसी भीड़ में से एक छोटा बच्चा शांतिपूर्वक सीधा राजा की ओर बढ़ा।

वह बच्चा सीधे राजा के पास गया और उसे छू लिया। अब राजा उसी का हो गया… और राजा की हर चीज भी।

कहानी से सीख

यह कहानी दर्शाती है कि हम सभी लोग ईश्वर की बनाई चीजें — गाड़ी, बंगला, पैसा — पाने में लगे रहते हैं, लेकिन उसे भूल जाते हैं जिसने सब कुछ बनाया

“जब आप स्वयं राजा (ईश्वर) को पा लेते हैं, तो उसकी हर चीज स्वतः आपकी हो जाती है।”
भगवान की वस्तुएं नहीं, भगवान को पाने की कोशिश कीजिए।

जो लोग सत्य को जान लेते हैं, वे उसकी बनाई चीजों को नहीं, बल्कि उस परमात्मा को पाने में जीवन समर्पित कर देते हैं।

अब फैसला आपका है

आपको धन चाहिए या उस धनदाता का साथ?
क्या आप राजा की चीजें चाहते हैं या स्वयं राजा?

सोचिए और निर्णय लीजिए... क्योंकि जो ईश्वर को पा लेता है, वह सब कुछ पा लेता है।

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