!! घड़ी की सुइयाँ !!
रामु अपने छोटे से कमरे में गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में केवल घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। जैसे ही बड़ी सुई छोटी सुई से मिली, उन्होंने बातचीत शुरू की।
"ठीक हूँ बहन, तुम कैसी हो?"
बड़ी सुई बोली कि वह चलते-चलते थक चुकी है, हर कोई आराम कर रहा है लेकिन उसे और छोटी सुई को तो कभी चैन नहीं। छोटी सुई ने सहमति जताई और दोनों ने चलना बंद कर दिया।
सुबह जब रामू उठा तो धूप देखकर चौंक गया। घड़ी अभी भी दो बजा रही थी।
रामू के पिता घड़ी को घड़ीसाज़ के पास ले गए लेकिन कोई खराबी नहीं मिली। घड़ी अब कबाड़ के बक्से में बंद कर दी गई।
"मेरा तो दम घुट रहा है। हमें कोई बाहर ले जाए!"
अब उन्हें अपनी पुरानी चमकदार ज़िंदगी याद आने लगी — मेज पर, फूलों के पास, जहां लोग उनकी टिक-टिक सुनते थे और रामू उन्हें बड़े प्यार से साफ करता था।
उन्होंने महसूस किया कि बिना चले, उनका कोई महत्व नहीं। अब वे फिर से चलने लगीं, इस उम्मीद में कि कोई उनकी टिक-टिक सुनेगा और उन्हें फिर से बाहर निकालेगा।
“चलना ही जिन्दगी है।” जब तक आप सक्रिय हैं, तभी तक आपकी उपयोगिता है। आलसी और निकम्मों का कोई मूल्य नहीं। इसीलिए जीवन में स्थिर नहीं, सक्रिय रहिए — क्योंकि यही सफलता और संतोष की कुंजी है।

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